देखते ही देखते, फिर ऋतू बदल गई- रीना अग्रवाल

मनोरंजन

देखते ही देखते, फिर ऋतू बदल गई, सुबह की मासूमियत फिर ठंडी ओस में नहाने लगी , फिर पेड़ो पर नए पत्ते घर बनाने लगे और फूलो से लगी डालियाँ फिर मुस्कुराने लगी |

दिन और रात बदलते बदलते कब मौसम भी बदल गए पता ही नई चला। फिर पतझड़ गया फिर बहार आयी , फिर पंछियों ने नए घोंसले बनाये , फिर रिमझिम फुहार आई। पर हम आँखों में सपने समेटे आगे बढ़ने के उम्मीद में वहीँ खड़े रह गए। सब कुछ बदल रहा है आस पास पर लगता है कुछ बदला ही नहीं। दिल में उदासी करवटे बदल रही है , बेचैनी भी हिलोरे मार अब थक गई पर राह जैसे आगे बढ़ती ही नहीं। कुछ पाने की प्यास है , मंज़िल ठीक से पता नहीं पर मिलने की आस है। रोज़ दिल का सूरज डूबता है, फिर नयी उम्मीद की किरण लिए उगता है। आशा की पतवार हाथों में लिए फिर चल पड़ता है सफर पर। अपने ही अस्तित्व की कश्मकश में छूटे गए कितने ही किनारे, कैसा ये सफर है जो कटा तो है पर कटा ही नहीं। तारिक बदलती है पर दिन बदलता ही नहीं।

फिर भी चलना तो है दस्तूर जगत का, चले चलो, बढ़ते चलो , शायद कोई मोड़ मुद जाये जिसकी सपनो की गली से बात मुलाकात हो। अरमानो को मंज़िल मिल जाये , कुछ सुकून सा आ जाये। पर कहते है ना जिस चीज़ को पूरी शिद्दत से चाहो तो सारी कायनात उसे आप तक पहुँचा ही देती है। कुदरत अपनी पूरी शक्ति के साथ आपकी मंज़िलो को पाने में आपका साथ निभाती है। यही कुछ बातें, ऐसे ही कुछ विश्वास अँधेरे दिल में फिर उम्मीद की रोशनी का दिया जलाती है और फिर मज़बूत इरादों के साथ मायूसी की थकान झाड़ते हुए फिर खड़े हो जाते है और चल पड़ते है अपनी मंज़िल की खूबसूरत डगर पर, यही तो है सन्देश बहते झरनो का , लहराती, मचलती बहती नदियों का, रोज़ सुबह खिलती सूरज की किरणों का, पंख फैलाते आसमान में उड़ते परिंदो का।

अब रुकना नहीं रुक जाना नहीं
छट गयी काली घटा दूर हुआ अंधकार
निकला है सूरज फैला उजियारा
देखु जिस ओर बिखरी है सुनहरी छटा

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